karan ki katha / दानवीर सूर्य पुत्र कर्ण की कहानी /

 कर्ण की कहानी / karan ki katha 

कौन थे कर्ण

कुंती-सूर्य पुत्र कर्ण को महाभारत का एक महत्वपूर्ण योद्धा माना जाता है। कुंती ने अपने बाल्यकाल में महर्षि दुर्वाशा की सेवा की थी तो ऋषि दुर्वाशा ने खुश  होकर कुंती को वरदान दिया कि वो जिस भी भगवान का आवाहन  ( प्रार्थना ) करेगी  उसे वह भगवान दर्शन देंगे और प्रशाद के रूप में एक पुत्र भी देंगे।

 

karan ki katha / दानवीर सूर्य पुत्र कर्ण की कहानी / https://hindiuse.in/karan-ki-katha-कर्ण/ ‎
karan ki katha / दानवीर सूर्य पुत्र कर्ण की कहानी   

सूर्य पुत्र कर्ण की कहानी

कुंती ने बाल्यकाल में एक बार अनजाने  में ही महर्षि दुर्वाशा के वरदान का प्रयोग किया और भगवान सूर्य का आवाहन किया तो भगवान ने कुंती को दर्शन दिया और प्रसाद  के रूप में एक पुत्र भी दिया।  परन्तु कुंती का विवाह नहीं हुआ था तो लोक-लाज के भय से कुंती ने कर्ण को गंगा नदी में बहा दिया।कर्ण गंगा नदी के परवाह में बहते हुए हस्तिनापुर के अधिरथ को मिला।

इसे भी पढ़े :- अर्जुन नहीं थे महाभारत के स्रवश्रेष्ठ धनुर्धर ?

कर्ण को हस्तिनापुर के अधिरथ और उसकी पत्नी राधा ने पाला माता राधा के नाम से ही  उसे  राधेय भी कहा जाता है। वैसे तो उसके धर्मपिता भगवान सूर्य थे परंन्तु उनका पालन-पोषण एक अधिरथ के घर में हुआ था इसलिए उसे   सुत पुत्र ही कहा जाता था।

कर्ण कि शिक्षा

कर्ण को बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र में रूचि थी। जब वह किशोर अवस्था में पहुचे तो उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या की शिक्षा देने का आग्रह किया परन्तु गुरु द्रोणाचार्य  एक सुत पुत्र को शिक्षा देने से मना कर दिया। फिर कर्ण  ने भगवान परशुराम की शरण ली और उनसे झुठ कहा की वो एक ब्राम्हण पुत्र हैं ।भगवान परशुराम ने कर्ण को धनुर्विद्या दी परन्तु जब भगवान परशुराम को पता चला की  उनसे झुठ बोल कर विद्या  प्राप्त  की हैं उन्होंने उस से कहा की ज़िन्दगी में एक ऐसा समय आएगा जब तुम्हे इस विद्या की सबसे ज्यादा जरूरत होगी लेकिन तुम इस विद्या को भूल चुके होगे।

इसे भी पढ़े :- एकलव्य को किसने और क्यों मारा ?

 

 कितने  पुत्र थे 

‘अंग’ देश के राजा कर्ण की पहली पत्नी का नाम वृषाली था। वृषाली से उसको वृषसेन, सुषेण, वृषकेत नामक 3 पुत्र मिले। दूसरी सुप्रिया से चित्रसेन, सुशर्मा, प्रसेन, भानुसेन नामक 4 पुत्र मिले।

कैसे हुई मृत्यु

कर्ण एक महान योद्धा होने के साथ साथ दानवीर भी थे उन्होंने अपने दिव्य कवच कुंडल का भी दान कर दिया था। युद्ध के समय जब  उसके रथ का एक पहिया धरती में धँस गया (धरती माता के श्राप के कारण)। वह अपने को दैवीय अस्त्रों के प्रयोग में भी असमर्थ पाता है, जैसा की उसके गुरु परशुराम का श्राप था। तब कर्ण अपने रथ के पहिए को निकालने के लिए नीचे उतरता है और अर्जुन से निवेदन करता है की वह युद्ध के नियमों का पालन करते हुए कुछ देर के लिए उसपर बाण चलाना बन्द कर दे।

इसे भी पढ़े :- जानिए कहाँ हैं विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर

तब श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं कि कर्ण को कोई अधिकार नहीं है की वह अब युद्ध नियमों और धर्म की बात करे, जबकि स्वयं उसने भी अभिमन्यु वध के समय किसी भी युद्ध नियम और धर्म का पालन नहीं किया था। उन्होंने आगे कहा कि तब उसका धर्म कहाँ गया था जब उसने दिव्य-जन्मा (द्रौपदी का जन्म हवनकुण्ड से हुआ था) द्रौपदी को पूरी कुरु राजसभा के समक्ष वैश्या कहा था। द्युत-क्रीड़ा भवन में उसका धर्म कहाँ गया था। इसलिए अब उसे कोई अधिकार नहीं की वह किसी धर्म या युद्ध नियम की बात करे और उन्होंने अर्जुन से कहा कि अभी कर्ण असहाय है (ब्राह्मण का श्राप फलीभूत हुआ) इसलिए वह उसका वध करे।

श्रीकृष्ण कहते हैं की यदि अर्जुन ने इस निर्णायक मोड़ पर अभी कर्ण को नहीं मारा तो सम्भवतः पाण्डव उसे कभी भी नहीं मार सकेंगे और यह युद्ध कभी भी नहीं जीता जा सकेगा। तब, अर्जुन ने एक दैवीय अस्त्र का उपयोग करते हुए कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया। शरीर के भूमि पर गिरने के बाद एक ज्योति  उस के शरीर से निकली और सूर्य में समाहित हो गई।

 

दोस्तों अगर आप को यह जानकारी पसन्द आई हो तो कॉमेंट्स और शेयर करना ना भुले।

 

 

loading...

Recommended For You.

जब पढने में मन ना लगे तो क्या  करे / पढाई में मन कैसे लगाये
जब पढने में मन ना लगे तो क्या  करे / पढाई में मन कैसे लगाये दोस्तों क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ
6 Comments

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *